Thursday, 9/6/2016 | 5:05 UTC+0

 

"हिन्दुस्तान में अरबी भाषा" के विषय पर दो दिवसीय सेमिनार

2-3 नवम्बर 2013, जामिया हमदर्द कन्वेंशन सेण्टर, नई दिल्ली

इस्लामिक फ़िक़्ह अकेडमी, इण्डिया ने हिन्दुस्तान में अरबी ज़ुबान व अदब (भाषा व साहित्य) की तरक़्क़ी का जायज़ा लेने के लिए दो दिन का एक सेमिनार 2 व 3 नवम्बर को दिल्ली में हमदर्द यूनिवर्सिटी के कन्वेंशन सेण्टर में आयोजित किया। इस सेमिनार में हिन्दुस्तान के बङे तालीमी इदारों और यूनिवर्स्टियों से जुङे दानिश्वरों और आलिमों ने शिरकत की। लखनऊ स्थित मशहूर मदरसा दारुल ऊलूम नदवा के प्रिंसिपल और इण्टीग्रल यूनिवर्सिटी लखनऊ के चांसलर जनाब डाक्टर सईदुर्रहमान आज़मी ने इस सेमिनार  की अध्यक्षता की। 

सेमिनार का उद्घाटन 2 नवम्बर को अंग्रेज़ी पत्रिका मिल्ली ग़ज़ैट्ट के एडीटर और अरबी भाषा के स्क़ॉलर जनाब डा. ज़फ़रुल इस्लाम ख़ां के ख़ुसूसी लेक्चर से हुआ। जिसमें उन्होंने हिन्दुस्तानी ज़ुबानों पर अरबी भाषा के प्रभाव की मिसालें देते हुए हिन्दुस्तान में अरबी बोलचाल और अरबी लेखन की तारीख़ पर रोशनी डाली। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्हों ने कहा कि अरबी भाषा के अनगिनत अलफ़ाज़ हिन्दुस्तान में आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा आज तक बने हुए हैं। जैसे माशाअल्ला, अल्हम्दुलिल्लाह, ला होल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाह, अस्तग़फ़िरुल्लाह वग़ैरह बोल सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं बोलते बल्कि फ़िल्मी डॉयलाग और गीतों में इनके स्तेमाल से यह आम तौर से लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ गए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि एसे बहुत से अलफ़ाज़ का मतलब समझे बिना बोले जाने से उन्हें बदले हुए अर्थों में भी स्तेमाल किया जाता है।  

 

इस्लामिक फि़क़्ह अकेडमी का तेईसवां फि़क़्ही सेमीनार 

दिल्ली में चार रोज़ा इल्मी तरबियती वर्कशॉप

अकेडमी ने जामेअतुल इमाम मुहम्मद बिन सऊद अल-इस्लामिया रियाज़ के एक जै़ली इदारा मर्कज़ अल-तमय्यूज़ अल-बहसी फ़ील क़ज़ाया अल-मुआसिरा के तआवून व इश्तिराक से चार रोज़ा तरबियती वर्कशॉप दिल्ली में मुन्अकि़द किया जिसमें 60 से ज़्यादा दीनी मदारिस के नौजवान उलेमा शरीक हुए।

इस वर्कशॉप में सऊद यूनिवर्सिटी के चार असातिज़ा ने नए अन्दाज़ और मनहज से मुहाजि़रात पेश किए और मशक़ें कराईं। इस वर्कशॉप की ख़ुसूसियत यह थी कि इसमें तमाम शुरका ने लैपटॉप का इस्तेमाल किया और बराहे-रास्त नेट कनेक्शन के ज़रिए मुख़तलिफ़ वेबसाइट से मालूमात हासिल करने के तरीके़ सिखें। 

 

इस्लामिक फि़क़्ह अकेडमी का तेईसवां फि़क़्ही सेमीनार

फि़क़्ह अकेडमी का सालाना फि़क़्ही सेमीनार जमबूसर गुजरात में 22 से 24 फ़रवरी 2013 ई॰ में मुन्अकि़द होगा। इस सेमीनार में देश-विदेश से तीन सौ से ज़्यादा उलेमा शरीक होंगे, सेमीनार के लिए तफ़्सीली सवालात जारी कर दिए गए हैं, इस सेमीनार के अहम मौज़ूआत चार हैं :

1-इस्तिसनाअ़
2-वसीयत और मीरास
3-हिबा
4-शहरियत

इस सेमीनार में रुयते हिलाल के सिलसिले में नीज़ रहमे मादर को किराया पर देने के सिलसिले में भी तजावीज़ पेश होंगी।

भारत में सामूहिक रूप से आधुनिक शरअ़ी समस्याओं के समाधान की विश्वसनीय संस्था
इस्लामिक फिक़्ह एकेडमी (इन्डिया)

स्थापना और पृष्ठभूमि

कोई भी फिक़्ह या क़ानून अपनी गतिशीलता से ही जीवित रहता है, जीवन की ऊर्जा और गति किसी भी जीवित क़ानून में प्रकट होती हैं, बदलती हुई परिस्थितियों के साथ क़ानून में समानता स्थापित करना बहुत नाजु़क और दायित्वपूर्ण कार्य है, इस्लामी फ़िक़्ह का स्थायित्व और परिस्थितियों और समय के परिवर्तनों के बावजूद मानव-जीवन में अनुशासन पैदा करने और उचित नेतृत्व प्रदान करने की पूर्ण योग्यता वास्तव में उन सैद्धान्तिक आदेशों की देन है, जिन्हें फ़क़ीहों ने क़ुरआन और हदीस से निकाला है और प्रत्येक युग में उस युग की परिस्थितियों को सामने रखकर फ़िक़्ही आदेशों से उनकी समानता स्थापित करने का नाजु़क कर्तव्य पूरा किया है।

एक समय था जब ऐसे महान व्यक्तित्व मौजूद थे जो क़ुरआन व हदीस, फ़क़ीहों के सामूहिक कथन, क़यास (अनुमान) के सिद्धान्त और आधार, और निष्कर्ष प्राप्त करने के तरीक़ों में पारंगत थे, शरीअत के सामान्य हितों और शरीअत क़ानून के उद्देश्यों और अभिप्रायों पर उनकी गहन दृष्टि थी और वह समय की नब्ज़ को पहचानते थे। अतः उन्होंने अपने युग में अपनी योग्यताओं का प्रयोग किया और अल्लाह से डरते हुए शरीअत के उद्देश्यों और धार्मिक नियमों पर मज़बूत पकड़ रखते हुए अपने युग की समस्याओं का समाधान तलाश किया, उन मुफ़्तियों और बुज़ुर्गों का फ़तवा प्रचलित मुद्रा की भांति मुस्लिम समाज में लोकप्रियता प्राप्त करता रहा।

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