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"हिन्दुस्तान में अरबी भाषा" के विषय पर दो दिवसीय सेमिनार

2-3 नवम्बर 2013, जामिया हमदर्द कन्वेंशन सेण्टर, नई दिल्ली

इस्लामिक फ़िक़्ह अकेडमी, इण्डिया ने हिन्दुस्तान में अरबी ज़ुबान व अदब (भाषा व साहित्य) की तरक़्क़ी का जायज़ा लेने के लिए दो दिन का एक सेमिनार 2 व 3 नवम्बर को दिल्ली में हमदर्द यूनिवर्सिटी के कन्वेंशन सेण्टर में आयोजित किया। इस सेमिनार में हिन्दुस्तान के बङे तालीमी इदारों और यूनिवर्स्टियों से जुङे दानिश्वरों और आलिमों ने शिरकत की। लखनऊ स्थित मशहूर मदरसा दारुल ऊलूम नदवा के प्रिंसिपल और इण्टीग्रल यूनिवर्सिटी लखनऊ के चांसलर जनाब डाक्टर सईदुर्रहमान आज़मी ने इस सेमिनार  की अध्यक्षता की। 

सेमिनार का उद्घाटन 2 नवम्बर को अंग्रेज़ी पत्रिका मिल्ली ग़ज़ैट्ट के एडीटर और अरबी भाषा के स्क़ॉलर जनाब डा. ज़फ़रुल इस्लाम ख़ां के ख़ुसूसी लेक्चर से हुआ। जिसमें उन्होंने हिन्दुस्तानी ज़ुबानों पर अरबी भाषा के प्रभाव की मिसालें देते हुए हिन्दुस्तान में अरबी बोलचाल और अरबी लेखन की तारीख़ पर रोशनी डाली। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्हों ने कहा कि अरबी भाषा के अनगिनत अलफ़ाज़ हिन्दुस्तान में आम आदमी की बोलचाल का हिस्सा आज तक बने हुए हैं। जैसे माशाअल्ला, अल्हम्दुलिल्लाह, ला होल वला क़ुव्वत इल्ला बिल्लाह, अस्तग़फ़िरुल्लाह वग़ैरह बोल सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं बोलते बल्कि फ़िल्मी डॉयलाग और गीतों में इनके स्तेमाल से यह आम तौर से लोगों की ज़ुबानों पर चढ़ गए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि एसे बहुत से अलफ़ाज़ का मतलब समझे बिना बोले जाने से उन्हें बदले हुए अर्थों में भी स्तेमाल किया जाता है।

डा. ज़फ़रुल इस्लाम ख़ां साहब ने बताया कि देश की बहुत सी लाएब्रेरियों में हाथ से लिखी अरबी की एसी मशहूर किताबें मौजूद हैं जिन की वजह से वे लाएब्रेरियां दुनिया भर में मशहूर हो गयी हैं। हिन्दुस्तान के आलिमों और दानिशवरों ने अरबी ज़ुबान में  इल्म, अदब और फ़िक्ह के मैदान में बहुत बङा काम किया है जिससे पूरे इस्लामी जगत में आज तक फ़ायदा उठाया जाता है। इसकी वजह से हिन्दुस्तान को दुनिया में ख़ास मुक़ाम मिला हुआ है। उन्होंने इसकी मिसाल में मजमआ बहारुल अनवार, तुहफ़तुल मुजाहिदीन, तफ़सीर अर्रहमान, तैसीरूल मन्नान, मुस्लिमुस्सूबूत, ताजुल उरूस, हुज्जतुल्लाहुल बालिग़ह और नुज़हतुल ख़वातिर जैसी किताबों का नाम लिया। इन किताबें से पूरी दुनिया के दीनी और इल्मी हलक़ों में फ़ायदा उठाया जाता है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अरबी विभाग के अध्यक्ष जनाब डाक्टर ज़ुबैर अहमद फ़ारूक़ी साहब ने इस मौक़े पर तक़रीर करते हुए कहा कि हिन्दुस्तान में अरबी भाषा में जो काम हुआ है उसने हिन्दुस्तान को मुस्लिम जगत में दूसरे ग़ैर-अरब मुल्कों के मुक़ाबले ख़ास मुक़ाम दिलाया है। उन्होंने मौलाना हबीबुर्रहमान आज़मी, मौलाना रशीद अमहद गंगोही, मौलाना ख़लीलुर्रहमान सहारनपुरी, फ़ैज़ुल हसन सहारनपुरी, ज़ैनुद्दीन मालीबारी, अब्दुल हई हसनी, मौलाना मसूद आलम नदवी, मौलाना अबुल हसन अली नदवी, अमीर ख़ुसरो, ग़ुलाम अली आज़ाद बिलग्रामी, शाह वलीउल्लाह दहलवी और ज़ुल्फ़िक़ार देवबन्दी जैसे रिसर्च सकॉलर्रस और आलिमों का हवाला देते हुए कहा कि इन सब ने अरबी भाषा में बहुत अहम किताबें लिखी हैं।
 

अलजज़ाइर के राजदूत जनाब शरीफ़ मुहम्मद हसन ने भी सेमिनार के उद्घाटन जलसे में ख़िताब किया। उन्होंने हिन्दुस्तान और अलजज़ाइर के सान्सकृतिक रिशतों पर रोशनी डालते हुए बताया कि अरबी ज़ुबान की वजह से यह रिशते बने और बढ़े हैं। उन्होंने अपने देश में अरबी के विकास से भी लोगों को अवगत कराया।

इण्टरनेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ फ़ॉरेन लैंगवेज्स हैदराबाद में अरबी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर मोहसिन उस्मानी साहब ने कहा कि अरबी ज़ुबान से दिलचस्पी और उसे सीखने, बोलने व लिखने की चाह आलिमों में क़ुर्आन की वजह से हुई है। कुर्आन से अक़ीदत और मुहब्बत ने अरबी ज़ुबान से मुहब्बत पैदा की और आलिमों ने उसका गहरा ज्ञान हासिल करके क़ुर्आन के पैग़ाम को समझने व समझाने का काम किया। उन्होंने बच्चों को अरबी सिखाने पर ज़ोर देते हुए कहा कि इतनी क़ीमती और अहम ज़ुबान को सीखने सिखाने में हमें कभी भी कमतरी का अहसास नहीं होना चाहिए।
 

ऑल इण्डिया एसोसिएशन ऑफ़ अरबी टीचर्स के अध्यक्ष जनाब डाक्टर नोमान ख़ां ने कहा कि अरबी इस्लाम की सरकारी भाषा है, इसी जज़्बे से मुसलमान अरबी से मुहब्बत करते हैं और इसी लिए मुसलमानों ने अरबी के मदरसे और इदारे क़ायम किए। इन इदारों में हर विषय पर अहम किताबें लिखी गयीं। 

सेमिनार के अध्यक्ष जनाब डाक्टर सईदुर्रहमान आज़मी साहब ने हिन्दुस्तान में अरबी ज़ुबान की आमद और यहां उसके विकास की तारीख़ बयान करते हुए कहा कि सातवी सदी में मुहम्मद बिन क़ासिम के साथ आने वाले लोग अरबी ज़ुबान अपने साथ लेकर आए। हिन्दुस्तान में अरबी को बाक़ी रखने का श्रेय मदरसों को प्राप्त है। उन्होंने बताया कि अरबी माध्यम से दीनी तालीम सिखाने का सिलसिला हिन्दुस्तान में सबसे पहले नदवा ने शुरू किया। नदवा से पढ़े हुए आलिम दुनिया के विभिन्न देशों में तालीम और रिसर्च के मैदान में काम कर रहें हैं।

इस से पहले सेमिनार के संयोजक मौलाना उबैदुल्लाह असअदी साहब ने महमानों का स्वागत किया और अकेडमी के प्रोग्रामों की जानकारी दी। जबकि जलसे का आग़ाज़ क़ारी अब्दुल बासित साहब ने क़ुर्आन शरीफ़ की तिलावत से किया। संचालन जनाब डाक्टर सफ़दर ज़ुबैर नदवी ने किया। उद्घाटन सेशन के बाद परिचर्चाओं का दौर शुरू हुआ। पहले सेशन में हिन्दुस्तान में “अरबी ज़ुबान व अदब का एतिहासिक परिदृश्य”विषय पर शोधपत्र पढ़े गए। इनमें डा. सईदुर्रहमान आज़मी, डा. ज़ुबैर अहमद फ़ारूक़ी, मुफ़्ती इक़बाल मुहम्मद तनकारवी, सैयद मुहम्मद तालिब, सैयद अब्दुल वहाब अलवीनी, सैयद हमीदुल बअदानी, सैयद महमूद अली अलमहदी, मुनीरुल इस्लाम बिन निज़ामुद्दीन, डा. ख़लदून सईद सबाह, ने अपने पेपर पढ़े। इस सेशन की अध्यक्षता डा. ज़ुबैर अहमद फ़ारूक़ी  साहब ने की और संचालन  जनाब प्रोफ़ेसर हबीबुल्लाह ख़ां साहब ने किया।
 

दूसरा सेशन जवाहर लाल नहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर असलम इस्लाही साहब की अध्यक्षता में हुआ जिसका संचालन जे. एन. यू के ही डा. क़ुतुबुद्दीन नदवी साहब ने किया। इस सेशन में हिन्दुस्तान में “अरबी ज़ुबान व अदब की विभिन्न कलाओं के विकास” पर पेपर पढ़े गए। जनाब ज़करिया नदवी, जनाब डा. जमशेद अहमद नदवी, जनाब डा. अय्यूब ताजुद्दीन नदवी, जनाब डा. क़ासिम आदिल नदवी, जनाब डा. ग़ितरीफ़ शहबाज़ नदवी, जनाब डा. अज़मतुल्लाह नदवी, जनाब डा. नईमुल हसन असरी, जनाब सैयद क़मरुद्दीन, जनाब मुहम्मद असअद नदवी और जनाब डा. सुहेब अहमद साहब ने पेपर पेश किए।

तीसरा सेशन दूसरे दिन 3 नवम्बर की सुबह प्रो. मोहसिन उस्मानी साहब की अध्यक्षता में आयोजित हुआ, जिसका संचालन डा. मुज़फ़्फ़र आलम साहब ने किया। इस सेशन में “हिन्दुस्तान में अरबी ज़ुबान व अदब की तालीम के तरीक़े और निज़ाम” पर चर्चा हुई। जनाब डा. मुबीन सलीम नदवी, जनाब प्रो. हबीबुल्ला ख़ां, जनाब डा. अब्दुल माजिद क़ाज़ी, जनाब डा. नसीम अख़्तर नदवी, जनाब एजाजुल हसन क़ासमी, जनाब प्रो. शाद हुसैन कशमीरी, जनाब डा. अब्दुल ख़ालिक़ नदवी, जनाब सैयद शमीम निज़ामी, जनाब जसीमुद्दीन क़ासमी और जनाब प्रो. मोहसिन उस्मानी साहब ने अपने पेपर पढ़े। चौथा सेशन “सांस्कृतिक सम्बंधो को मज़बूत करने में अरबी की भूमिका” विषय पर हुआ। इसकी अध्यक्षता ड़ा. अब्दुल क़ादिर ख़ां साहब क़ासमी ने की और संचालन डा. अय्यूब ताजुद्दीन साहब ने किया। इसमें जनाब डा. मुज़फ़्फ़र आलम, जनाब डा. अकरम फ़लाही, जनाब डा. मुहम्मद फ़ोज़ान अहमद, जनाब डा. मुजीब अख़तर नदवी और जनाब डा. अब्दुल क़ादिर ख़ां साहब ने अपने पेपर पढ़े। पांचवा सेशन उसी दिन “अरबी ज़ुबान को बढ़ावा देने में हिन्दुस्तान के आलिमों और दानिशवरों की भूमिका” पर हुआ। इसकी अध्यक्षता कशमीर यूनिवर्सिटी में अरबी विभाग के अध्यक्ष जनाब डा. शाद हुसैन साहब ने की और संचालन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के के जनाब डा. मुबीन असलम साहब ने किया। जनाब आरिफ़ जमील क़ासमी, जनाब अशरफ़ अब्बाल क़ासमी, जनाब डा. मुहम्मद अय्यूब, जनाब डा. क़ुतुबुद्दीन, जनाब डा. अब्दुर्रहमान, जनाब क़मर शअबान, जनाब अब्दुर्रहमान और जनाब मुहम्मद सदरुल इस्लाम साहब ने अपने पेपर पढ़े।
 

सेमिनार का समापन सेशन डा. हबीबुल्लाह ख़ां साहब की अध्यक्षता में हुआ। इस सेशन में जनाब आरिफ़ जमील क़ासमी, जनाब मुज़फ़्फ़र आलम, जनाब डा. हमीदुल बअदानी और जनाब इनाम नदवी ने सेमिनार के बारे में अपने विचार पेश किए। इस सेशन में एक क़रारदाद (प्रस्ताव) भी पास की गयी।

क़रारदाद

  1. अरबी ज़ुबान व अदब पढाने वाले शिक्षकों की यह ज़िम्मेदारी है कि तालिबे इल्मों (छात्रों) के अन्दर अरबी बोल चाल और अरबी लेखन की सलाहियत पैदा करें। ताकि अरबी अदब का स्तर ऊंचा उठाने वाले अरबी साहित्यकार तैयार हों।
  2. अरबी के शिक्षक अपने कम से कम एक बच्चे को अरबी ज़ुबान की शिक्षा ज़रूर दिलाएं। इस तरह आम लोगों को भी अपने बच्चों को अरबी सिखाने की प्रेरणा मिलेगी।
  3. अरबी के शिक्षक अरबी भाषा में रिसर्च का काम जारी रखें और अरबी भाषा में अहम विषयों पर अच्छे स्तर की किताबें लिखने पर ध्यान दें।
  4. यह सेमिनार एक कमेटी बनाने की सिफ़ारिश करता है जो अरबी का जदीद अदब (नवीन साहित्य) तैयार कराने के लिए काम करे।
  5. यह सेमिनार सिफ़ारिश करता है कि अरबी लेखन की कमियों को दूर करने और अरबी सुलेख के विभिन्न तरीक़ों की शिक्षा देने के पाठ भी अरबी की पाठ्य पुस्तकों और पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाएं।
  6. यह सेमिनार अपील करता है कि अरबी के पाठ्यक्रमों में हिन्दुस्तानी अरबी लिट्रेचर का चेप्टर भी ब़ढ़ाया जाए ताकि हिन्दुस्तान के आलिमों द्वारा अरबी में किए गए कामों की जानकारी भी तालिबे इल्मों को मिल सके।
  7. यह सेमिनार इस बात की ज़रूरत भी महसूस करता है कि हिन्दुस्तानी भाषाओं के साहित्य को अरबी में अनुवादित किया जाए। ताकि अरब मुल्कों में हिन्दुस्तानी भाषाओं के अदब की जानकारी बढ़े। इसके लिए अरबी के शिक्षकों को आगे आना चाहिए।
  8. यह सेमिनार भारत सरकार से अपील करता है कि सरकारी दफ़्तरों के काम-काज में अरबी भाषा के स्तेमाल की इजाज़त दे और भारत के पिछले कालों की तरह अरबी को भारत की राष्ट्रीय भाषाओं की सूची में शामिल करे।

समापन समारोह में रिसर्च स्कॉलरों को सर्टिफ़िकेट भी दिए गए। अन्त में अकेडमी के मुफ़्ती जनाब अहमद नादिर अलक़ासमी ने शुक्रिया अदा किया और जनाब मुफ़्ती साजिद क़ासमी ने दुआ कराई।         

 

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