Thursday, 9/6/2016 | 5:05 UTC+0

भारत में सामूहिक रूप से आधुनिक शरअ़ी समस्याओं के
समाधान की विश्वसनीय संस्था

इस्लामिक फिक़्ह एकेडमी (इन्डिया)
 

स्थापना और पृष्ठभूमि

कोई भी फिक़्ह या क़ानून अपनी गतिशीलता से ही जीवित रहता है, जीवन की ऊर्जा और गति किसी भी जीवित क़ानून में प्रकट होती हैं, बदलती हुई परिस्थितियों के साथ क़ानून में समानता स्थापित करना बहुत नाजु़क और दायित्वपूर्ण कार्य है, इस्लामी फ़िक़्ह का स्थायित्व और परिस्थितियों और समय के परिवर्तनों के बावजूद मानव-जीवन में अनुशासन पैदा करने और उचित नेतृत्व प्रदान करने की पूर्ण योग्यता वास्तव में उन सैद्धान्तिक आदेशों की देन है, जिन्हें फ़क़ीहों ने क़ुरआन और हदीस से निकाला है और प्रत्येक युग में उस युग की परिस्थितियों को सामने रखकर फ़िक़्ही आदेशों से उनकी समानता स्थापित करने का नाजु़क कर्तव्य पूरा किया है।

एक समय था जब ऐसे महान व्यक्तित्व मौजूद थे जो क़ुरआन व हदीस, फ़क़ीहों के सामूहिक कथन, क़यास (अनुमान) के सिद्धान्त और आधार, और निष्कर्ष प्राप्त करने के तरीक़ों में पारंगत थे, शरीअत के सामान्य हितों और शरीअत क़ानून के उद्देश्यों और अभिप्रायों पर उनकी गहन दृष्टि थी और वह समय की नब्ज़ को पहचानते थे। अतः उन्होंने अपने युग में अपनी योग्यताओं का प्रयोग किया और अल्लाह से डरते हुए शरीअत के उद्देश्यों और धार्मिक नियमों पर मज़बूत पकड़ रखते हुए अपने युग की समस्याओं का समाधान तलाश किया, उन मुफ़्तियों और बुज़ुर्गों का फ़तवा प्रचलित मुद्रा की भांति मुस्लिम समाज में लोकप्रियता प्राप्त करता रहा।

वर्तमान परिस्थतियाँ ये है कि समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं, विज्ञान और तकनीक के विकास ने नये क्षितिज प्रदान किये हैं, दुनिया एक छोटी-सी बस्ती बन गई है, आर्थिक और वित्तीय मामलों में नये विकासों ने नयी समस्याएँ उत्पन्न की हैं, जो लोग इस्लाम पर चलना चाहते हैं और शरीअत को अपने सामाजिक जीवन, व्यापार और जीवन के अन्य क्षेत्रों में मार्गदर्शक का मानक बनाकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, उनके मन में ऐसे सैकड़ों प्रश्न उठ रहे हैं, जिनके सम्बन्ध मंस वह उलमा और मुफ़्तियों की सहायता माँगते हैं और उनसे मार्गदर्शन चाहते हैं। दूसरी ओर ऐसे व्यापक व्यक्तित्वों की कमी हो गई है जो ज्ञान और शोध के आधार पर इन समस्याओं का समाधान कर सकें और जिनका एक ही फ़तवा भी मुस्लिम समाज में स्वीकार्य हो।

इसलिए आवश्यकता थी कि सामूहिक चिन्तन प्रक्रिया की आधारशिला रखी जाए और उलमा और विद्वान पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा इन समस्याओं का ऐसा समाधान प्रस्तुत करें जो शरीअत के सिद्धान्तों के अनुकूल और चिन्तन के अपवादों से मुक्त हो। इस सामूहिक चिन्तन के उदाहरण हमें सहाबियों के युग में और उनके बाद भी मिलते हैं, यही वह उद्देश्य था जिसके लिए ‘‘इस्लामिक फ़िक़्ह एकेडमी इन्डिया’’ का गठन किया गया था, जिसमें एक तरफ़ शरअ़ी आदेशों की समय के साथ समानता स्थापित करने के लिए शोध करने वाले उलमा और महान मुफ़्तियों के शोधों से लाभ प्राप्त किया जाता है और दूसरी तरफ़ समस्या की प्रकृति की व्याख्या के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के विशेषज्ञों की जानकारियों से भी मौक़ा से लाभ उठाया जाता है, ख़ुशी की बात यह है कि एकेडमी के फ़ैसलों की आत्मा शरीअत से अनुकूलता, सन्तुलन के कारण अब इस एकेडमिक और शोध प्रक्रिया की प्रतिध्वनि भारत से बाहर भी सुनी जाने लगी है।

अभिप्राय एवं उद्देश्य

एकेडमी के अभिप्राय एवं उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  1. क़ुरआन व हदीस, सम्मानित सहाबा और पूर्वज उलमा के तरीक़े और ‘‘शरीअत के उद्देश्य’’ के सिद्धान्तों व नियमों के अनुसार शरअ़ी दृष्टिकोण से वर्तमान काल की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और औद्योगिक समस्याओं का समाधान तलाश करना।
     
  2. इस्लामी फ़िक़्ह के स्रोतों, उसके नियमों और सिद्धान्तों और फ़िक़्ही विचारधाराओं की व्याख्या और निरूपण और वर्तमान युग के अनुसार उनको लागू करना ।
     
  3. इस्लामी फ़िक़्ह को आधुनिक शैली में प्रस्तुत करना।
     
  4. समकालीन आवश्यकताओं और उद्देश्यों की रौशनी में फ़िक़्ही विषयों के शोध और अध्ययन का कार्य सम्पादित करना।
     
  5. समसामयिक शोधकर्ताओं और उलमा और वर्तमान समस्याओं और मामलों में विश्वसनीय भूमिका का निर्वाह करने वाली धार्मिक संस्थाओं के विचारों और फ़तवों को प्राप्त करना, फिर उनको इस तरह प्रकाशित करना कि अधिक से अधिक मुसलमान उससे प्रयाप्त रूप से लाभान्वित हो सकें।
     
  6. अपने देश और विदेशों में जहां भी फ़िक़्ही और शोध संस्थाएँ स्थापित हैं उनसे सम्पर्क स्थापित रखना, ज्ञानवर्धक जानकारियों और विचारों का आदान-प्रदान करना, फिर उन उलमा या उनकी विश्वसनीय संस्थाओं के प्रकाशित या अप्रकाशित फ़तवों और फ़ैसलों को आवश्यकता और उपयोगिता के अनुसार भारतीय उलमा तक पहुँचाना, ताकि उनकी उपयोगिता का क्षेत्र विस्तृत हो सके।
     
  7. जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय उलमा के विचारों और फ़तवों को एकत्र करना और आवश्यकतानुसार उन्हें अरबी और अंग्रेज़ी आदि भाषाओं में परिवर्तित करना ताकि उनका दृष्टिकोण विद्वानों तक पहुँच सके।
     
  8. पूर्ववेत्ताओं (Orientalists) और अन्य लोगों की ओर से इस्लामी क़ानून और आदेशों के सम्बन्ध में जो सन्देह उत्पन्न किये जा रहे हैं, उनका समाधान करना और इस सम्बन्ध में उचित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।
     
  9. उलमा और विशेष रूप से फ़ज़ीलत की डिग्री प्राप्त करने वाले नवयुवक उलमा का उत्साहवर्धन करना, ताकि उनके अन्दर भी शोध और अनुसंधान का उत्साह विकसित हो और अनुभवी उलमा के साथ उनकी बैठकें रखना ताकि वे उनके ज्ञान और अनुभव से लाभ उठा सकें।
     
  10. विभिन्न फ़िक़्ही विषयों और फ़िक़्ही किताबों का इन्डेक्स तैयार करना।
     
  11. फ़िक़्ही पांडुलिपियाँ जो अब तक प्रकाशित नहीं हुई हैं उन पर शोध और टीकाकरण का कार्य कराना और उन्हें प्रकाशित कराना।
     
  12. धार्मिक विश्वविद्यालयों और संस्थानों के छात्रों और उनसे शिक्षा प्राप्त लोगों को आवश्यक और मौलिक समसामयिक ज्ञान से अवगत कराने की व्यवस्था करना, तथा आधुनिक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से सम्बन्धित छात्रों के लिए इस बात की व्यवस्था करना कि वह शरीअत क़ानून के सिद्धान्तों और आधारभूत ज्ञान और विवेक और प्रवृत्ति से इसकी समानता को जान सकें, ताकि ऐसे व्यक्तित्व तैयार हो सकें जो शरअ़ी ज्ञान और कला से भी अवगत हों तथा दूसरी तरफ़ समय की आवश्यकताओं की जानकारी भी रखते हों।

एकेडमिक के प्रयास

एकेडमी ने अपनी तेईस वर्षीय एकेडमिक यात्रा में ज्ञान और चिन्तन के स्तर पर उल्लेखनीय सेवाएँ की हैं, जिनमें आधुनिक फ़िक़्ही साहित्य का उर्दू अनुवाद, आधुनिक समस्याओं पर फ़िक़्ही परिचर्चाएँ और विचारगोष्ठियाँ आयोजित करना, फ़िक़्ही विचारधाराओं का आयोजन और चिन्तन का नया तरीक़ा प्रस्तुत करने के प्रयास उल्लेखनीय हैं, इस एकेडमिक कार्यों में फ़िक़्ही सेमिनारों का आयोजन भी हैं, अतः एकेडमी ने महाराष्ट्र, गुजरात, करनाटक, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली में अब तक 21 फ़िक़्ही सेमिनार आयोजित किए, जिनमें कुल मिलाकर लगभग 127 से अधिक विषय चर्चा में आये, जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं जिनका विस्तृत वर्णन आगे आ रहा है।
 

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